आदिवासी समाज द्वारा पत्थलगाडी, उसका प्राचीन इतिहास

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कुछ दिनों से झारखंड की राजनीति में पत्थल गाड़ी शब्द उपलब्ध कराया है जहां लोग अपने गांव के बाहर पत्थर गाड़कर संविधानिक चेतावनियां आदि लिखी जा रही है। हमारी टीम ने इसके प्राचीन इतिहास को जानने की कोशिश की है।

आदिवासी समाज पत्थर गाड़ी कोई नई परंपरा नहीं है यह आदिवासी समाज की परंपरा में शामिल है इसके माध्यम से समाज अपने नियम कानून या प्रतीकों को संकलित करता और प्रदर्शित करता है। आदिवासी इतिहास लेखन के दौरान यह पुरातात्विक साक्ष्य तौर पर इतिहासकारों की मदद करता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से पत्थर गाड़ी आदिवासी और झारखंड सरकार के मध्य विवाद का कारण बना हुआ है । आदिवासी समाज खासकर मुंडा समुदाय को जानने वालों के लिए पत्थर गाड़ी कोई नई परंपरा नहीं है । यह उनकी सामूहिक सामुदायिक अभिव्यक्ति का संस्कृति का हिस्सा है जाहिर है पत्थर गाड़ी का जुड़ाव परंपराओं से है। अन्तः के संबंध में की जाने वाली किसी भी नकारात्मक टिप्पणी को आदिवासी अपनी प्रतिष्ठा पर ले लेते हैं।

वर्तमान समय में झारखंड सरकार द्वारा किस प्रकार के पत्थर गढ़ी कि आड़ में अफीम के अवैध धंधे  और राष्ट्र विरोधी ताकतों के संरक्षण के बाद सामने लाई जा रही है। उसके बाद आदिवासियों का विरोध करना स्वाभाविक हो जाता है । दरअसल पत्थर गाड़ी का हालिया विवाद झारखंड खूंटी जिले बिरसा मुंडा का जन्मभूमि से शुरू हुआ है। और धीरे-धीरे जिले के अन्य गांव तक भी पहुंच गया जिसमें उन्होंने प्रशासन से सड़क बिजली पानी इत्यादि बुनियादी सुविधाओं की मांग की थी इसके साथ ही ग्रामीणों ने प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी भी दी थी कि पहले विकास संबंधी कार्यों को पूरा किया जाए तभी गांव में प्रशासन किसी भी व्यक्ति को प्रवेश मिलेगा। अब तो यह बात रही पत्थर गाड़ी की वर्तमान स्थिति के बारे में। लेकिन आदिवासी समुदाय से कई हजारों वर्ष से पत्थर गाड़ी करते आ रहे हैं आइए नजर डालते हैं इसके इतिहास पर।

आदिवासी समाज में पत्थलगड़ी

पत्थर गाड़ी पत्थर स्मारकों को कहा जाता है जिसकी शुरुआत आदिवासी समाज ने हजारों साल पहले की थी यह एक पाषाणकालीन परंपरा है ।जो आदिवासी में आज भी प्रचलित है माना जाता है कि मृतकों की याद सच होने खगोल विज्ञान को समझने कबीलों के अधिकार के क्षेत्र के सीमांकन को दर्शाने सामूहिक मान्यताओं को सोचनी करने आदि उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राचीन काल से आदिवासी खासकर मुंडा समाज पत्थर स्मारकों की रचना करता रहा है और जिसे पत्थलगड़ी का नाम दिया गया।

दुनिया भर के विभिन्न आदिवासी समाजों में पत्थर गढ़ी की यह परंपरा मौजूद है और बरकरार है झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जिनमें कई अवसरों पर पत्थर गढ़ी करने की परंपरा प्राचीन काल से आज भी प्रचलित है। पुरातात्विक विज्ञान और इतिहासकारों के अनुसार पत्थल गड़ी आदिवासी समुदाय मैं कब शुरू हुआ इसकी सही सही जानकारी नहीं है। वैसे तो दुनिया का सबसे पुराना पत्थर गाड़ी Gobekli Tepe को माना जाता रहा है जिन्होंने कम से कम ईसा पूर्व 10वीं शताब्दी मैं पत्थर गाड़ी की थी।

पुरातात्विकको के अनुसार पत्थलगड़ी कई प्रकार के होते हैं

  1. पत्थर स्मारक- इस प्रकार के पत्थर स्मारक के तौर पर अकेले गाड़ी जाते हैं।
  2. मृतक स्मारक पत्थर चौकोर और टेबलनुमा आकार के होते हैं जैसे कि चोकुहतु झारखंड का ससंदीरी का पत्थर स्मारक।

कतार नुमा स्मारक पत्थर यह कतार में या फिर समान रूप से एक कतार में होते हैं।

  1. अर्धवृत्ताकार स्मारक पत्थर इनका उपयोग भी स्मारक पत्थर के रूप में किया जाता है।
  2. वृत्ताकार स्मारक पत्थर यह पूरी तरह से गोल होते हैं जैसे कि महाराष्ट्र के नागपुर स्थित जुनापानी के सिलावद में पाया जाता है।
  3. खगोलीय स्मारक पत्थर यह अर्थ वृत्ताकार वृत्ताकार वी आकार के होते हैं जैसे कीर्तन करी बरवाडीह झारखंड के पत्थर स्मारक।

मुंडा आदिवासियों के अनुसार पत्थर गढ़ी चार प्रकार के होते हैं

1. ससंनदीरी :यह तो मुंडारी शब्दों से बना है “ससन” और “दीरी” । “ससन” का अर्थ है कब्रगाह यह शमशान जबकि दीरी का अर्थ है पत्थर होता है। ससनदीरी मैं मृतकों को दफनाया जाता है और उनकी कब्र के ऊपर या पत्थर रखा जाता है और यह आदिवासी समुदाय ऐसा कई वर्षों से करते आ रहे हैं झारखंड में मुंडाओं का सबसे प्राचीन और विशाल इस प्रकार का पत्थर स्मारक चोकाहतु झारखंड के एक गांव में देखा जा सकता है।

2. बुरुदीरी :- मुंडारी भाषा में गुरु का अर्थ पहाड़ पर्वत होता है इस तरह इसका अर्थ क्या निकलता है कि इस तरह के पत्थरों को गांव के सीमांकन से बाहर लगाया जाता है ताकि गांव के सीमा को रेखांकित किया जा सके।

3.हुकुमदीरी :- हुकुम अर्थात दिशा एवं निर्देश या आदेश जब मुंडा आदिवासी समाज कोई नया सामाजिक राजनीतिक सांस्कृतिक निर्णय लेता है तब उसकी उद्देश्य के लिए इसकी स्थापना की जाती है।

4. टाईडी दीरी:- इस तरह के पत्थर गाड़ी सामाजिक राजनीतिक निर्णय और सूचनाओं को सार्वजनिक घोषणा घोषणा के रूप में जो पत्थर स्मारक खड़े किए जाते हैं उन्हें कहा जाता है।

 

वर्तमान समय में पत्थर गाड़ी झारखंड में ।

वर्तमान समय में झारखंड सरकार द्वारा किस प्रकार पत्थर गाड़ी की आड़ में अफीम के अवैध धंधे और राष्ट्र विरोधी ताकतों के संरक्षण की बात सामने लाई जा रही है। उसके बाद आदिवासियों का विरोध करना स्वाभाविक हो जाता है दरअसल पत्थर गाड़ी का हालिया विवाद झारखंड के खूंटी जिले जहां बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था से शुरु हुआ है पिछले दिनों खूंटी जिले के कई पंचायतों के ग्रामीण इलाकों के बाहर पत्थरों पर अपने विकास संबंधी मांगों को लेकर यह पत्थर गाड़े गए थे जिसमें उन्होंने प्रशासन से सड़क बिजली पानी इत्यादि बुनियादी सुविधाओं की मांग की थी इसके साथ ही ग्रामीणों ने प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी भी दी थी कि पहले विकास संबंधी कार्यों को पूरा किया जाए तभी गांव में प्रशासन के किसी व्यक्ति को प्रवेश मिलेगा।

जब पुलिस द्वारा इसकी छानबीन की गई और पूछताछ के लिए ग्राम प्रधान को पकड़ कर ले गई तो ग्रामीणों ने पूरन गांव के पास पुलिस जवानों को बंधक बना लिया था। जब तक कि ग्राम प्रधान को मुक्त किया गया तब तक ग्रामीणों ने पुलिस जवानों को बंधक बनाए रखा। पुलिस द्वारा और प्रशासन के साथ मिलकर इस मामले को सुलझाने के लिए एक ही गांव से बातचीत करने के लिए टीम बनाई गई लेकिन इसके उल्टे पुलिस द्वारा अफीम की अवैध खेती गांव वालों द्वारा किए जाने का आरोप लगाया गया इस कारण पत्थर गाड़ी कर पुलिस प्रशासन को गांव में आने से रोक रहे हैं पत्थर गाड़ी को अवैध अफीम की खेती के साथ जुड़े जाने के बाद मामला और बिगड़ने लगा धीरे-धीरे खूंटी जिला के कई और आदिवासी गांव में भी पत्थर गाड़ी करना शुरू कर दिया है।

झारखंडी मुंडा आदिवासी समाज के संस्कृति मैं पत्थर गाड़ी इनकी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। आदिवासी समाज के लिए तो अपनी संस्कृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। झारखंड आदिवासी अस्मिता के आधार पर बना हुआ राज्य है। अतः सरकार को विकास के लिए ऐसी योजनाएं बनानी होगी जिसका आधार आदिवासी संस्कृति को कुल मिलाकर झारखंड सरकार को पथलगाडी  के गलत और सही के विवाद में ना पढ़कर इस सांस्कृतिक प्रतीक को अपनाना चाहिए। बड़े पैमाने पर ग्राम पंचायत को पत्थर गाड़ी के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए । एक प्रशासनिक तंत्र को विकसित कर पत्थर गाड़ी के माध्यम से रखी गई मांगों और सूचनाओं को सरकार से जोड़ा जाना चाहिए। अगर लोकतांत्रिक सरकार को सकारात्मक करने का प्रयास करें जिसके माध्यम से आदिवासी समाज के शोषण और जरूरतों जानकारी आधुनिक मीडिया के माध्यम से नहीं मिल पाती है वह इसके के माध्यम से उसे मिलने लगेगी।

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