एक दर्दनाक प्रथा स्त्रियों को हमेशा के लिए अपंग बनाने की

रहस्यमय तथ्य

चीन की एक दर्दनाक प्रथा समाज में जिंदगी भर के लिए महिलाओं को अपंग बनाने की प्रथा रही है.

औरतों के प्रति दुनिया के हर समाज में प्राचीन काल से भेदभाव हमेशा से रहा है । जो वहां की समाज में के अलग-अलग प्रथाओं में देखने को मिलता है। ऐसा ही चीन के समाज में जिंदगी भर के लिए महिलाओं को अपंग बनाने की प्रथा रही है। जब महिला या बेटी 2 साल की हो जाती है तो उसके पैर बांध दिए जाते हैं ताकि वह बड़ी ना हो सके और पुरुषों को आकर्षित कर सकें । इसकी वजह से औरत ताउम्र एक अपाहिज की जीवन जीने को मजबूर हो जाती है।

चीन में ऐसी परंपरा भी रही है जिसमें पैरों को बांधकर पत्थरों से कुचल दिया जाता था।

चीन के इतिहास में प्राचीन काल में ऐसे भी परंपरा थी । जिसमें बेटी जो 2 साल की हो जाती थी तो उसके पैरों को बांध दिया जाता था । लगभग एक 20 फुट लंबा सफेद कपड़ा लड़कियों के पैरों पर लपेट दिया जाता था । अंगूठे के अलावा पैर की सभी उंगलियों को भीतर की तरफ मुड़ते हुए कपड़ा लपेटा जाता था । फिर लपेटे हुए पैरों के ऊपरी हिस्से को एक बड़े पत्थर से कुचल दिया जाता था और छोटी बच्चियां दर्द से बिलबिला उठती थी।

आवाज दबाने के लिए मुंह में कपड़ा ठूंस आ जाता था.

बेटियां जब दर्द से चीखती थी, तो उनकी मां उनका चीखना-चिल्लाना बंद करने के लिए उनके मुंह में कपड़ा ठूंस देती थी। पैरों को पत्थर से कुचल ने किया क्रिया कोई एक दिन नहीं बल्कि बार-बार वर्षों तक दोहराई जाती थी । इस तरह से पैरों की सारी हड्डियां कुचल देने के बाद भी उनके पैरों को दिन रात मोटे कपड़े से बांधकर रखा जाता था, क्योंकि जैसे ही पैरों को कपड़े के बांदे से आजाद किया जाता था फ़ौरन।दौड़ने शुरू कर देते थे।

बेटियां जब दर्द से जीती थी। हाथ जोड़कर अपनी मां से मिन्नत करती थी। उनके पैरों को खोल दिया जाए लेकिन मां भी रोती लेकिन उनके पैरों को नहीं खुलती थी । मां अपनी मजबूरी दर्शाती और कहती यदि उन्होंने उनके पैरों को खुला छोड़ दिया तो यह पैर उसकी सारी जिंदगी बर्बाद कर देंगे उनके भविष्य की खुशी उनके पैरों को कुचलने नहीं है । कुचले पैर परिवारिक समृद्धि और स्त्री के समर्पण के प्रतीक थे।

पुरुषों को उत्तेजित करते थे महिलाओं की यह बंधे पैर

अगर चीनी इतिहास को पलट कर देखे करीब 1000 साल पहले किसी चीनी सम्राट के हरम की किसी महिला द्वारा इसकी शुरुआत माना जाता है छोटे-छोटे पैरों पर बत्तखों की तरफ खुदा खुद आकर चलती हुई औरत नासिर पुरुषों के लिए उत्तेजित मानी जाती थी बल्कि पुरुष इन छोटे बंधे हुए पैरों के साथ खेलते हुए उत्तेजित होते थे क्योंकि वह पेड़ हमेशा बेहद खूबसूरत  जूतों से ढके रहते थे.

1917 तक इस तरह की परंपरा चीन में चलती रही है.

बुढ़ापे तक महिलाएं इस बंधे हुए पैर के दर्द से कराहती रहती थी पैरों के उभरे हुए हिस्से कि कुछ ली हुई हड्डियों में तो दर्द होता ही था होगा उससे भी ज्यादा तकलीफ उंगलियों के नाखून में होती थी नीचे की तरफ लगातार बढ़ने के कारण उनके नाखून पीछे की ओर बढ़ गए होते थे 1917 तक यह प्रथा मैं चली आ रही थी उसके बाद इस प्रथा का बहिष्कार किया गया।

इस प्रथा पर आधारित एक किताब भी लिखी गई “वाइल्ड स्वान्स” (Wild Swans: Jung Chang)  जुंग चांग द्वारा लिखी गई इस किताब का चीन में विरोध भी किया गया और चीन में से प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद दुनिया भर में 10 मिलियन से भी अधिक प्रितिया इस किताब की बिकी।

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