कर्नाटक चुनाव में क्या संविधान की हत्या की गई?

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भारतीय राजनीति में कर्नाटका चुनाव को लेकर गहमागहमी है .कर्नाटका में तीन पार्टी है जिस में अकेले भाजपा को 104 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी है.

कर्नाटका में सबसे बड़े दल के नेता बीजेपी नेता येदियुरपपा मुख्यमंत्री बने। ज्ञात हो कि बीजेपी को कुल 104 सीट मिले हैं. जिसे कर्नाटका में सबसे बड़ी पार्टी बनी है. अन्य पार्टियों में कांग्रेस को 78 सीट ,जेडीएस को 38 सीट और अन्य को 2 सीट मिली है.

जिस तरह से कर्नाटक चुनाव को लेकर देशभर में गहमागहमी है । उसे यह सवाल उठता है, कि क्या वाकई में बीजेपी द्वारा संविधान की हत्या की गई है? और बिना बहुमत के उन्होंने अपने नेता येदिउरप्पा को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई।

क्या वाकई में संविधान की हत्या कर्नाटक चुनाव में हुई?

कर्नाटका में सबसे बड़े दल के नेता येदिउरप्पा मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। इस प्रकार संविधान और बोम्मई रिपोर्ट का एक साथ पालन हुआ है। अगर निर्धारित समय के अनुसार अगर पार्टी अपना बहुमत सदन में साबित नहीं कर पाती है जो उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ेगी जय संविधान की व्यवस्था का तकाजा था।

संविधान में कहीं भी बहुमत शब्द का उल्लेख नहीं है। अनुच्छेद 164 में यह अवश्य लिखा है, कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेंगे। लेकिन इस अनुच्छेद को दूसरे के साथ जोड़ कर देखना चाहिए अनुच्छेद 164 (दो) में लिखा है, कि मंत्रिपरिषद विधानसभा के विश्वास पर्यंत रहेंगे। इसका मतलब यह है, कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति के समय राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि उसे विधानसभा में विश्वास हासिल हो सकता है या नहीं। यह संसदीय व्यवस्था को संचालित करने वाला प्रावधान है ।यदि किसी पार्टी का चुनाव पूर्व बने गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला हो ,तो राज्यपाल के समक्ष कोई विकल्प नहीं होता। तब वह बहुमत दल या गठबंधन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करता है । राजपाल संविधान प्रदत्त अपने विवेक का प्रयोग निरंकुश विधानसभा में कर सकते हैं।

कर्नाटक चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला

कर्नाटका में किसी एक पार्टी या चुनाव पूर्व बने गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है । भाजपा 104 सीटों के साथ अकेली सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन बहुमत से पीछे है। भाजपा ने विधायक दल की बैठक में येदिउरप्पा को नेता चुनने के बाद राज्यपाल के समक्ष दावा पेश किया था। राजपाल वजुभाई वाला को इस दावे पर विचार करना था। दूसरा दावा कांग्रेस और जीडीएस का था। जहां कांग्रेस और जेडीएस अपने विधायकों के साथ पूर्ण बहुमत होने का दावा कर रही है। वहीं कांग्रेस और जेडीएस के पास बहुमत के जादुई आंकड़े से 4 सीटें अधिक है।

विधायक दल की बैठक और चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत परिणाम जारी होने के पहले ही कांग्रेस और जेडीएस के नेता राजपाल के यहां पहुंच गए । दोनों की संख्या बहुमत से 4 अधिक थी। राज्यपाल ने उनको उचित जवाब दिया, कि अधिकृत परिणाम आने तक सभी दावेदारों को इंतजार करना चाहिए अधिकृत परिणाम भी आ गए। कांग्रेस और जीडीएस ने विधायक दल की बैठक भी की लेकिन इन दोनों बैठकों में से कई विधायक गायब नजर आए । कांग्रेस के 12 और जेडीएस के दो विधायक बैठक में नहीं पहुंचे मतलब विधिवत दावा पेश करने से पहले ही कांग्रेस और जेडीएस के 10 विधायक लिंगायत समुदाय के हैं। यह लिंगायत मठों के संपर्क में है । इन्हें मुख्यमंत्री के रूप में कुमारस्वामी मंजूर नहीं है । यह विधायक लिंगायत समुदाय के भाजपा नेता येदिउरप्पा की राह में बाधक नहीं बनना चाहते । जाहिर है कांग्रेस अपने ही बने जाल में उलझ गई है, उसने चुनाव से पहले लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने वाली कार्ड चली थी।

इससे भाजपा को तो नुकसान नहीं हुआ, लेकिन कांग्रेस के कई विधायक अलग होते दिखाई दे रहे हैं । कांग्रेस ने संख्या ही नहीं सम्मान भी खोया है। उसने अपने से आधी संख्या वाले क्षेत्रीय दल के सामने समर्पण कर दिया . फिर भी सत्ता में भागीदारी का अवसर नहीं मिला। फिर भी सत्ता में भागीदारी का अवसर कांग्रेस को नहीं मिला इसके बाद वह से सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख करना पड़ा कुछ दिन पहले उसे या बड़ी गड़बड़ियां दिख रही थी। लेकिन सत्ता में घुसने का मौका हाथ से निकला तो यही की शरण लेनी पड़ी । ऐसा ही कांग्रेस के सिद्धारमैया ने जेडीएस के प्रमुख देवीगौडा की फोटो मुख्यमंत्री कार्यालय से फेंकवा दी थी। लेकिन चुनाव परिणाम आया तो सारी हेकड़ी गायब हो गई । जाहिर है कि राज्यपाल के समक्ष जो दावे थे,पहले भाजपा का जिस के सभी विधायक उसके साथ ,जो अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर कर्नाटका में उभरकर आई है । दूसरा कांग्रेस और जेडीएस का दावा जिनकी संख्या विधायक दल की बैठक में ही कम हो गई थी । अनुपस्थिति विधायकों को हटा दें तो इनके बहुमत का दावा भी ध्वस्त हो गया था । इसके अलावा सरकार बनाने के पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं बल्कि अधिकतम सौदेबाजी  शुरू हो गई थी .खुलेआम मलाईदार विभागों पर दावेदारी चल रही थी ।एक तो संख्या कम हो गई ऊपर बंदरबांट जैसी बातों ने अंतः राजपाल का काम आसान कर दिया सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के अलावा उनके सामने अन्य कोई विकल्प ही नहीं बचा था.

कर्नाटका चुनाव में जब बात सबसे बड़े दल की चली, तो कांग्रेस को गोवा मणिपुर याद आ गया। यह वह सबसे बड़ी पार्टी थी । लेकिन बहुमत से दूर थी लेकिन उसे सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया गया । सबसे बड़ी पार्टी को भुला ना तभी आवश्यक होता है, जब कई दावेदार हो और इनके बहुमत को लेकर संशय हो। बोम्मई आयोग की रिपोर्ट में भी विचार प्रतिपादित था ।बहुमत पर दुविधा की दशा में राजपाल सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का आमंत्रण दें। उसके बाद विधानसभा के पटल पर बहुमत का परीक्षण हो कर्नाटक के राज्यपाल ने यही किया गोवा और मणिपुर का उदाहरण कर्नाटका पर लागू नहीं होता। गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी ,गोवा पीपुल्स फ्रंट से भाजपा के ही करीबी बनकर चुनाव लड़े थे। चुनाव में उन्होंने भाजपा का नहीं कांग्रेस का ही विरोध किया था ।बिना किसी सौदेबाजी के उन्होंने भाजपा को समर्थन दिया । कांग्रेस के साथ जाने से इनकार कर दिया विधानसभा में ऐसा कोई नहीं था। जो कि कांग्रेस का समर्थन करता ऐसे में बहुमत से दूर कांग्रेस को सरकार बनाने का आमंत्रण देना अनैतिक होता यही स्थिति मनीपूर और मेघालय में भी थी.

कांग्रेस आज कर्नाटक के राज्यपाल पर हमला बोल रही है। लेकिन इस पद के दुरुपयोग के अधिक मामले उसी के खाते में है। इसकी शुरुआत संविधान लागू होने के 7 वर्ष बाद ही शुरू हो गई थी। तब केरल की बहुमत सरकार को हटाया गया था। बहुमत के दावे और विधायक की भौतिक उपस्थिति के बाद भी अल्पमत की सरकार बनवा देने के अनेक उदाहरण है कर्नाटका में ही 8 वर्ष पहले राज्यपाल ने यदुरप्पा की सरकार को बहुमत परीक्षण के बावजूद हटा दिया था । यहीं पर व्यंकट शुभ बयान ए एस आर बोम्मई को बहुमत के बाद भी हटाया था। हरियाणा में राज्यपाल गणपति राव ,उत्तर प्रदेश में रमेश भंडारी, बिहार में बूटा सिंह ,झारखंड में सैयद सिब्ते रजी आदि राजपाल को बहुमत को नजरअंदाज करने वाले राज्यपाल के रूप में याद किया जाएगा । यह खुलकर कांग्रेस के पक्ष में खेले थे। एक दिलचस्प संयोग देखिए आज जो जीडीएस के मुखिया है । वह तब देश के मुख्यमंत्री थे जो आज कर्नाटक के राज्यपाल हैं। वह गुजरात भाजपा के अध्यक्ष थे ,बताया जाता है कि केंद्र के इशारे पर गुजरात के राज्यपाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री सुरेश मेहता को बर्खास्त कर दिया था ।आज वही देवगौड़ा अपने बेटे के मुख्यमंत्री ना बनने से परेशान है । निश्चित है कि इस प्रकार का तीनों पार्टियों के बीच मामला विधानसभा का मसला संवेदनशील होता है। कई बार एक ही फार्मूला सभी प्रांतों में लागू नहीं हो सकता क्योंकि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के तत्वों पर भी ध्यान देना चाहिए। राज्यपाल ने भी सभी तत्व पर सावधानी से विचार किया इस प्रकार व उचित निर्णय पर पहुंचे अब बहुमत का निर्णय विधानसभा में होगा एस आर बोम्मई के सुझाव पर उनके ही ग्रह प्रांत में अमल होना दुखद है।

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