क्यों घूमते है सारे गृह सूर्ये के चारो ओर?

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आप सब ये तो जानते है कि हमारे सौरमंडल में जितने भी गृह है, सब सूर्ये के चारो और चक्कर काटते है पर क्यों ? क्या आप ने कभी सोचा है?

अगर सारे गृह सूर्ये का चक्कर काटते भी है। पर क्यों?

जब कोई तारा बनता है। तो वह अपने चारों तरफ धूल और गैस की एक डस्ट डिस्क (dust Disc) बना लेता है। तारे के गुरुत्व की वजह से ये डिस्क के बीच अगर किसी छोटे पिंड गृह का निर्माण होता है तो जाहिर सी बात है वह भी डिस्क के साथ घूमेगा।

पिंड में विस्फोट या पिंड के छिटककर अलग होने के बाद भी इसकी रोटेशनल बरक़रार रहेगी। यही नहीं conservation of angular momentum की वजह से उसकी स्पीड और तेज़ हो जाती है।

क्योंकि gravity चारो तरफ से सामान रूप से उसे अपनी और खींचता है।

इसी तरह वह लगातार घूमता रहेगा और कई छोटे छोटे पिंड से आपस में टकराकर एक बड़े पिंड का रूप ले लेता है।

और जो की ग्रेविटी उसे चारो तरफ से उसे खिंचती है। जिसे वह छोटा सा पिंड जो अब तक एक बड़े गृह का आकार ले चुका है। किसी तारे के चारों तरफ चक्कर काटने लगती है।

यही कारण है कि गृह सूर्ये के चारों तरफ चक्कर काटते है।

पर इन की स्पीड अलग अलग क्यों होती है?

आपके मन में ये सवाल तो आ रहा होगा। हर गृह के चक्कर काटने की स्पीड अलग अलग होती है। सूर्ये के सबसे नजदीक गृह बुद्ध की गति काफी धीमी होती है।

ग्रहों की रोटेशनल स्पीड इस बात पर भी निर्भर करती है, किस गृह का निर्माण कितनी तेज़ी से हुआ है।

सुरुवती समय में पृथिवी की घूमने की गति काफी तेज़ थी। तब एक दिन आज के समय से बहुत कम था। जब तक की पृथिवी से टकराकर चाँद का निर्माण नहीं हुआ था । इस टक्कर से पृथिवि की घूमने की गति भी धीरे हो गयी।

इसलिए ग्रहो की रोटेशनल स्पीड अलग अलग है।

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