नवजात जन्मे बच्चे अपने मुट्ठी क्यों बंद करके रखते हैं?

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क्या आपने कभी यह गौर किया है, नवजात जन्मे बच्चे अपनी मुट्ठी हमेशा बंद रखते हैं पर क्यों?

अगर आपके घर में छोटे बच्चे है या फिर आपने कभी किसी अस्पताल में या फिर अपने ही फैमिली मेंबर के बीच कभी किसी नवजात बच्चे को देखा है। अगर देखा है, तो क्या आपने कभी गौर किया है? कि नवजात जन्मे बच्चे ज्यादातर अपनी मुट्ठी  बंद करके रखते हैं। पर क्यों?

अगर यही सवाल अगर आप किसी डॉक्टर से पूछते हैं तो वह भी यही बताएगा कि नवजात शिशु पामर ग्रेफस रिफ्लेक्स के कारण अपनी मुट्ठी बंद रखते हैं।

विज्ञान इस बारे में क्या कहता है?

प्राचीन काल से 1 सवाल लोगों के मन में चल रहा है ,कि “पहले मुर्गा आया या अंडा” की तर्ज पर हजारों साल से मानव यह सवाल पूछता रहा है, क्योंकि एक मानव का जन्म शिशु रूप में हो सकता है और एक शिशु जन्म से इतना कमजोर होता है कि बिना किसी माता-पिता के सहारे वह इस क्रूर दुनिया में अपने अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकता।

तो आखिर सृष्टि में पैदा हुआ प्रथम शिशु की देखभाल किसने की होगी?

लेकिन सभी सभ्यताओं ने इस जटिल सवाल का एक ही जवाब ढूंढा था । इसलिए हर सभ्यता में यह अवधारणा चली आ रही है, कि सृष्टि में पैदा हुआ प्रथम मनुष्य को स्वयं ईश्वर ने उपस्थित होकर जीवन संबंधी ज्ञान प्रदान किया था।

सबसे पहले ईसा 610 वर्ष पहले पैदा हुए महान ग्रीक विज्ञानिक अनेकसीमेंडर ईश्वर के हस्तक्षेप की संभावना को नकारते हुए यह थ्योरी दी थी की हो सकता है, कि “मनुष्य का विकास अन्य जीवो जैसे कि मछली से हुआ हो या फिर लाखों सालों के बदलाव के कारण धीरे-धीरे अन्य प्रजातियां मनुष्य रूप में परिवर्तित हुई हो”

ग्रीक के इस महान विज्ञानिक के तर्क विलक्षण थे और एक तरह से चार्ल्स डार्विन से भी हजारों वर्ष पूर्व “एवोल्यूशन थ्योरी” के वास्तविक खोजकर्ता कह जाने चाहिए।

अगर यह मान लिया जाए कि कि किसी नवजात शिशु को इस भीड़ भरी आधुनिक दुनिया से दूर इसे जंगल में छोड़ दिया जाए तो बेशक को समय के साथ आधुनिकता की ओर नहीं बढ़ेगा वहां रहते हुए आधुनिक तकनीकी या फिर सोशल मीडिया या इंटरनेट आधी चलाना शुरु नहीं कर देगा। वास्तव में किसी भी प्राणी या फिर इंसान धीरे धी सारी चीजें सीखता है या फिर उसका समाज उसे यह सब सिखाता है।

इससे तो यह तो साफ है कि सृष्टि के प्रथम शिशु को जीवन उपयोगी सरवाइवल टिप्स देने कोई ईश्वर नहीं आया था। बल्कि प्रथम “कोशिका से लेकर मानव त जीवो” की रूपांतरण किस प्राकृतिक प्रक्रिया में जियो का अस्तित्व सुरक्षित इसलिए वह पाया है क्योंकि प्रकृति द्वारा प्रदत सरवाइवल संबंधी ज्ञान सभी जीवो के दिमाग में होता है।

तू अगर बच्चों में मुट्ठी कसकर बंद करने की प्रवृत्ति अगर जन्म से होती है तो कहीं ना कहीं इसका संबं “सरवाइवल “से ही होता है।

इसलिए हमें यह प्रश्न कुछ अलग तरह से पूछना होगा” प्रकृति को यह जरूरी क्यों लगता है कि नवजात शिशु को अपनी मुट्ठी पूरे समय बंद रखनी चाहिए?”

अब इस प्रश्न का जो उत्तर निकल कर आएगा उसे आप प्रकृति द्वारा की गई व्यवस्था के बारे में जानने पर अचंभित रह जाएंगे। प्रकृति को यह बात बहुत जरूरी लगती है । प्रकृति इस से भी आगे बढ़कर कुछ करती है। नवजात शिशु जब अपनी मुट्ठी बंद करते हैं, तो उनका अंगूठा मुठी के भीतर रहता है। जबकि हम सभी अपना अंगूठा बाहर रखते हैं।

यहां नीचे दी गई इस तस्वीर पर आप साफ-साफ देख सकते हैं कि नवजात शिशु अपना अंगूठा अपनी मुट्ठी के अंदर रखता है। वह ऐसा क्यों करता है? वह बहुत अजीब मुद्रा है और ऐसा करना सहज नहीं होता।लेकिन नवजात शिशु जन्म लेने के कुछ समय बाद तक ही ऐसा करते रहता है। वह ऐसा 10- 15 दिन हो या फिर 1 महीने तक करते हैं ,फिर धीरे-धीरे हम लोगों की तरह अपनी मुट्ठी बंद करने लगते हैं।

इसका कारण यह है कि प्रकृति कुछ भी बिना कारण नहीं करती। नवजात शिशु के इस प्रकार मुट्ठी बंद करने के पीछे भी एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है लेकिन पहले तो आप यह सोचिए कि यदि वह हर समय अपनी मुट्ठी इस तरह बंद नहीं रखेंगे तो क्या हो जाएगा?

पहले तो आप यह जान ले कि मां की गर्भ में बच्चे के खुले हाथ बहुत सारी गड़बड़ियां कर सकते हैं। फिर भी अंगूठे को मुट्ठी के भीतर रखने की क्या जरूरत है? नवजात शिशु का कमजोर सा दिखने वाला नन्हा सा अंगूठा भला क्या गड़बड़ कर सकता है?

अब हम अपने प्रश्न के उत्तर तक पहुंच गए हैं हमें यह जानना जरूरी है कि स्त्री के गर्भ के भीतर सबसे नाजुक चीज बच्चा नहीं होता बल्कि वह पतली झिल्लीदार एमनीओटिक थैली होती है। जिसमें बच्चा लिपटा होता है। इस थैली में बच्चे को पोषण देने वाला एमनियोटिक द्रव भरा होता है। इस थैली को मामूली खरोच या चुंबन भी इतनी क्षति पहुंचा सकती है ,कि बच्चे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है । डॉक्टर भी गर्भवती स्त्री की जांच वगैरा करते वक्त पूरी सावधानी बरतते हैं ताकि एमनीओटिक सैक को कोई खतरा ना हो।

इसीलिए मनुष्य के नवजात शिशु के हाथों में होने वाले” पामर ग्रैब रिफ्लेक्स” मां को मजबूती से जकड़ने के लिए नहींबल्कि एमनियोटिक थैली को नाखून की खरोच से बचाने के लिए है नवजात शिशु के नाखून बहुत छोटे और पतले होते हैं लेकिन उनमें बहुत धार होती है. मुट्ठी बंद होने पर और अंगूठी के मूर्ति के भीतर होने पर प्रकृति याह सुनिश्चित कर देती है,कि मां और शिशु दोनों सुरक्षित रहें।

लेकिन अब सवाल यह भी उठता है कि नाखून तो पैरों में भी होते हैं और पैरों को तो मुट्ठी की तरह नहीं सिकोड़ा जा सकता है? गर्भ में शिशु अपने पैर चलाते रहते हैं फिर पैरों की उंगलियों के नाखून से एमनीओटिक थैली को नुकसान क्यों नहीं पहुंचता?

इसका उत्तर बहुत रोचक है ,कभी आपको अगर यह मौका मिले तो नवजात शिशु के पैरों के नाखून गौर से देखिएगा । आप देखेंगे कि उनके पैरों के नाखून उंगलियां और अंगूठे के नाखून कि तरह आप बाहर निकले नहीं होते। बल्कि इस प्रकार से धसे हुए होते हैं कि उनके धारदार किनारे पैरों के अंगूठे और उंगलियों की त्वचा के नीचे दबे होते हैं । यही कारण है कि नवजात शिशु के हाथों के नाखून काटने की जरूरत पड़ती है। लेकिन पैरों के नाखून काटने की जरूरत बाद में पड़ता है । प्रकृति को यह पता है ,कि पैरों के नाखून हाथों के नाखून की तरह मुट्ठी में नहीं छुप सकते हैं। इसलिए प्रकृति ने इस तरह बेहतरीन ढंग से व्यवस्था की है । नवजात शिशु चारों और त्वचा से घिरे रहे ताकि उनके धारदार किनारे कहीं खरोच ना लगा सके।

अब एक प्रश्न और उठता है यदि गर्भावस्था में शिशु किसी कारण से अपनी मुट्ठी बंद नहीं कर सके तो क्या होगा?

ऐसा होने पर सबसे सामान्य बात यह हो सकती है कि उसके नाखून एमनीओटिक थैली को नुकसान पहुंचा देंगे जिसके अलग-अलग परिणाम हो सकते हैं लेकिन इससे अंतर नुकसान ही होता है गर्भावस्था में शिशु के मुट्ठी बंद नहीं कर पाने पर एक अन्य गंभीर जटिलता हो सकती है । जैसे “एमनीओटिक बैंड सिंड्रोम” भी कहते हैं। आपने ऐसा शिशु या व्यक्ति कभी देखा होगा जिनके जन्म से ही कोई हाथ या उंगली या पंजे यह हाथ पैर का कोई भाग नदारद होता है यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होती है और मेडिकल साइंस यह मानता है कि ऐसा तब होता है जब नवजात शिशु के हाथों या पैरों के प्रहार से एमनियोटिक थैली की परत टूट या उखड़ जाती है। और उस के टुकड़े यार ऐसे शिशु के हाथ या पैर के साथ लिपट कर उन हिस्सो को बढ़ने से रोक देती है लेकिन ऐसा शिशु के नाखून या हाथ-पैर की झिल्ली से टकराने पर हमेशा नहीं होता कभी कभी अचानक अपने आप ही हो जाता है और इसके कारणों का अभी तक पता नहीं चला है।

 

 

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