बैंकरों की दुर्दशा और बढ़ता एनपीए

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10 लाख करोड़ रूपये कॉर्पोरेट NPA : सरकार का सविनय-सहयोग आन्दोलन और बैंकर दुर्दशा

( यह लिखा गया आर्टिकल हमारे फेसबुक पेज पर पोस्ट की गई आर्टिकल की कॉपी है)

यह आर्टिकल हमारे फेसबुक पेज पर एक अक्टूबर को पोस्ट की गई थी

देश के राष्ट्रीकृत बैंकों में वेतन पुनर्निर्धारण की जब-जब बात छिड़ी तो कई लोगों को उनके कलेजे पे सांप लोटने की अनुभूति होने लगी…….देश -विदेश में बैठे भक्त सज्जन पुरुष NPA के गणितीय समालोचना में व्यस्त होने लगें …केंद्र और राज्य सरकारों में काम करने वाले कई लोगों को लगा की बैंकर को सैलरी मिल रही है वही बहुत है …बैंक घाटे में और ये वेतन बढ़ोतरी की बात करते हैं……इन लालचियों को शर्म आनी चाहिए ..एक ने कहा …नोट बंदी में बैंकरों ने खूब काली कमाई की ….इनकी कई पुश्ते तो अब बैठ कर खायेंगे ….फिर भी सैलरी चाहिए…..हे राम क्या कलयुग है ….
काम के दवाब में कुछ बैंकरों के आत्महत्या की खबर जब अख़बारों में छपी तो कहा ….इन्होने जिन्दगी भर चोरी की अब सुसाइड करके शहीद बनने की कोशिश कर रहे हैं ये कमीने…….. .मै उनके जोर-जोर चिल्लाने वाले एकतरफा तर्क से कुछ पल के लिए खामोश हो गया……. मै सोचने लगा की आखिर इनके टीचर कौन है / हमारे व्यक्तिगत सैलरी की बढ़ोतरी की बात पर इनके पेट में इतनी इर्ष्यापूर्ण -दर्द क्यों ? दर्शन शास्त्र में एक टर्म पढ़ा था EPOCHE ….अर्थात एक ऐसी मानसिक स्थिति जिसमे किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होने पर कोई न्यायधीश भी कभी किसी घटना के सत्य का निष्कर्षण या निर्णय-करण नहीं कर सकता ….हाल के कुछ महीनो –सालों से टीवी मीडिया और सोशल मीडिया के दलाल सियासी खेल से प्रेरित होकर दिन रात बहकाने और तोड़ने वाला दोगला ज्ञान दे रहे हैं…..यह ज्ञान चाय के राजनितिक केतली से निकलकर लिट्टी-चोखा, सैंडविच , दारु-बीडी …..सभी के ग्रुप डिस्कशन का बेमिशाल हिस्सा बनती है ……आधे ग्लास पानी के बारे में ये कहा जाय की ये आधा खाली या आधा भरा है तो दोनों ही बाते सत्य है…………किन्तु एक तथ्य को छुपाकर केवल दूसरा पूरक तथ्य कहा जाय तो कहानी और तस्वीर स्वतः पूरी तरह से उलट जाती है ….यही बात बैंकों के NPA के सन्दर्भ में लागू होती है/
इनकी गोबर छाप सोच और विश्लेष्ण के हेराफेरी का जवाब मै प्रमाणिक आंकड़ों -तथ्यों से यहाँ लेख्यांकित करता हूँ …..
1. 24 जुलाई 2018 को केन्द्रीय वित्त विभाग ने प्रश्न संख्या 693 के जवाब में संसद में दबे आवाज में ये स्वीकार किया की महज 4387 अमीर लोगों के पास सरकरी बैंकों का कुल 8,59,532 करोड़ रुपया NPA के रूप में दबा हुआ है …..ये कुल ख़राब ऋण 10 लाख करोड़ का 84% है/ 10 करोड़ से हज़ार करोड़ रूपये तक वाले ये वो ऋण है जिन्हें कोई आम बैंकर ….कर्मचारी, अधिकारी या मेनेजर प्रदान नहीं करता है बल्कि ये सरकार के निर्देश और रिज़र्व बैंक के निगरानी पर पर बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स तय करते है की किसे लोन देना और किसे नहीं …….99.9 बैंकर्स की ऐसी किसी तथाकथित बड़े ऋण परियोजना में कोई रोल नहीं होता ……जब निहत्थे बैंकर इन पैसों को वसूलने के लिए अपने संप्रभु सरकार से मदद मांगती है तो सरकार मौन व्रत धारण कर लेती है …….बार -बार और हर बार डिफाल्टर्स बड़ी आसानी से एअरपोर्ट और फिर परदेश को रफ्फूचक्कर हो जाते हैं…..जाँच एजेंसियां, पुलिस, सेना , तोप टैंक लड़ाकू विमान , मिसाइल और एटम बम सब के सब स्टेचू हो जाते हैं……वहीँ स्टेचू जो हम बचपन में गेम के रूप में भी खेलते थे ….बहुत सारे आर्थिक-राजनितिक विश्लेषक यही मानते है की यह सब कॉर्पोरेट चंदे का घिनोना खेल है जो लम्बे समय से खेला जा रहा है और बदनामी का ठीकरा बाद में बैंकर पे फोड़ा जाता है ……राजनितिक पार्टियाँ इन्ही लुटेरों से लूट के पहले और बाद में अपना हिस्सा लेती है ठीक वैसे ही जैसे बॉलीवुड फिल्म में गुंडों से पुलिस हर लूट के बाद हफ्ता वसूलती है /
2. शेष के 14 % का एक बड़ा हिस्सा समाज और वोट कल्याण में प्रदत्त हुए हैं……जैसे कृषि ऋण, शिक्षा ऋण, लघु और मध्यम व्यवसायों के लिए ऋण जो की प्रारम्भ से ही सरकार द्वारा कंपल्सरी निश्चित किये हैं …ये लोन नहीं बाँटने पर पेनल्टी और दुसरे सजा का प्रावधान भी है …….इसके अलावे चुनावों के ठीक पहले वोट प्रतिशत को बढ़ाने के लिए स्थानीय से राष्ट्रिय स्तर तक हर छोटे-बड़े नेता और सरकारी अफसर ऋण -बाँट के लिए डराने –धमकाने और भीड़ को उकसाने का काम करती है ……बैंकरों को लिए तब हालात इधर कूँआ उधर खाई वाली हो जाती है …..परन्तु ऋण देने के बाद जब यही खाता ख़राब हो जाता है तो यही नेता कुछ दलाल मीडियाकर्मियों के माध्यम से अपने गुनाह की कालिख बैंकरों के ऊपर पोत देते हैं……..दलाली मीडिया और बिके हुए नेताओं का चरित्र चित्रण विजय माल्या के उस ट्विटर बयान से भी होती है जहाँ इस डिफाल्टर ने चेतवानी दी थी की ……..वे मीडिया और नेता अपना मुंह बंद रखे जिन्होंने समय- समय पर हमसे भांति-भांति की सुख-सुविधाएँ ली हैं /
3. यह भी यहाँ उल्लेखनीय है की साल 2010 में बीजेपी के समर्थन और लार –प्यार से ही दारु बेचने वाला विलफुल डिफाल्टर विजय माल्या राज्य सभा का सदस्य बना था / हाल-फिलहाल में विजय माल्या और अरुण जेटली की विशेष मैत्रिक मुलाकात की चर्चा वायरल है /
4. हाल ही में पूर्व RBI गवर्नर ने अपने एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया की ….उन्होंने प्रधान मंत्री कार्यालय को कई-कई बार हाई प्रोफाइल NPA फ्रॉड के कई मामलों की लिखित शिकायत की थी पर उसपे कोई कारवाई नहीं की गयी ……क्यों….आखिर क्यूँ…??……क्या कमल छाप पार्टी इनके लिए कोमल छाप पार्टी बन गयी है /
5. इसी रिपोर्ट में उनहोंने यह भी भविष्यवाणी की है की राजनीती से प्रेरित और प्रभावित होकर जिस तरह नोट/चंदा (कॉर्पोरेट ऋण ) और वोट (कृषि ,मुद्रा ऋण ) के लिए धड़ल्ले से बड़े पैमाने पे लोन बांटे और माफ़ किये जा रहे हैं…….उससे एक दिन पुरे देश के अर्थव्यवस्था में सुनामी की आशंका प्रकट हो गयी है / राजनितिक भ्रष्टाचार और राजनीती में सस्ती लोकप्रियता के तत्व बैंकों के काल बनके उभरे है /
6. दावोस के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मलेन में नीरव मोदी और प्रधानमंत्री का एक फ्रेम में आना क्या महज संयोग है ?
7. चीन जैसे कई देशों ने अपने यहाँ विल्फुल डिफाल्टर्स पर लगाम लगाने के लिए उनके पासपोर्ट हमेशा के लिए जब्त कर लिए और उन्हें वायु और रेल सेवा से हमेशा के लिए वंचित कर दिया ….साथ ही कुछ दिनों या महीनो में उनकी पूरी सम्पति नीलाम कर दी ताकि बैंकों में जमा किया गया आम नागरिकों का पैसा बैंकों में सुरक्षित लौट आये / भारत में इन तरीके को लागू करने में क्या परेशानिया हैं …..यही न की अपनों का दर्द अपनों से देखा नहीं जाता /
8. ऋण वसूली में भारत के विश्व में रैंकिंग 102 देशों के बाद आता है / अमेरिका और जापान जैसे देश जहाँ 6 महीने में 90 % उधार की बसूली कर लेते हैं वही भारत में 5 सालों तक में 25 % तक भी नहीं हो पाता / इस विशाल अंतर के पीछे है राजनितिक चरित्र का स्तर /
9. एक रिपोर्ट के मुताबिक 80 फीसदी नेताओं के सम्पति/ दौलत में इजाफा ज्यामिति विधि से भी अधिक गति से हुआ है / इसका खुलासा दो विभिन्न चुनाओं में दिए गये आय सम्बंधित हलफनामे से हुआ /
आखिर कैसे ???? इस गरीब देश विकास के ऐसे त्वरित तकनीक की आवश्यकता है /देश हित में इसे सार्वजनिक कर देना चाहिए /
10. इसका जवाब कौन देगा की नोटबंदी के दौरान किस प्रयोजन से अधिकांश नए नोट RBI के द्वारा प्राइवेट बैंक में डाले गये जबकि कई –कई गुना भीड़ सरकारी बैंकों के आगे लाइन लगा के खड़ी थी ……बाद में नोटबंदी का 99 फीसदी हेराफेरी इसी प्राइवेट चैनल से संपन्न हुआ किसी की मेमोरी कमजोर पड़ गयी हो तो गूगल और यू-टयूब देख ले /
11. एक तरफ वर्तमान सरकार कहती है की विदेशों में हाल में भारत का मान-सम्मान बढ़ा है ….भारत के प्रतिष्ठा और ताकत को विकसित देश भी अब सलाम करते हैं…….जो एक हद तक सच भी है …….फिर प्रश्न यही है की माल्या और नीरव जैसे भगोड़े के प्रत्यर्पण के मांग पर ये मुल्क भारत की अनदेखी क्यों करते हैं….उत्तर है की स्वयं सरकार नहीं चाहती की ये भगोड़े/लुटेरे कभी भारत वापस आये ….इनके भारत वापस आने से सभी उनके राजनितिक पार्टनर्स का पर्दाफाश हो जाएगा /
क्रिमनल ओफेंस के लगभग प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मामले में सर्वप्रथम इंटरपोल रेड कार्नर नोटिस जारी करती है ताकि के दुसरे देशों में रह रहे अपराधियों को उसके देश सौंप दिया जाए ……विलफुल डिफाल्टर्स जैसे भगोड़े को क्रिमनल ओफेंस में वर्गीकृत करना सरकार के बाएं हाथ का खेल है …..सत्ता आपकी …..प्रचंड बहुमत आपका……फिर किस बात की लफ्फाजी और नौटंकी चल रही है /
नोट बंदी के महान योजना में आर्थिक रूप से शहीद हुए एक केशियर ने बताया की उन्हें नकदी की कमी के वजह से लगभग 3 लाख तक ऋण लेकर भरपाई करनी पड़ी ….पैसो के किल्लत के वजह से न बहन की शादी हुई न ही पिता का ठीक से इलाज…(जो बाद में चल बसे)…..उलटे बच्चों को प्राइवेट स्कूल से नाम कटवा कर गावं के सरकारी विद्यालय में डालना पड़ा / बदले में क्या मिला …..ने वेतन वृद्धि न सम्मान न प्रशंसा प्रशस्ति…. उल्टा सभी बैंकर को इस NPA के लिए चोर कहा जाने लगा/ किसी का पाप किसी और के माथे ढालने का पुरजोर प्रयास किया ताकि बैंकर अपने जायज वेतन वृद्धि की मांग को भूलकर काले पानी के गुलाम मजदूरों की तरह बीमार और मर जाने तक काम करते रहे / जैसे छोटा बिमारी छोटा डॉक्टर होता है वैसे ही बड़ी बिमारी के लिए बड़ा डॉक्टर होता है ……NPA के केस में बड़ा डॉक्टर अर्थात भारत सरकार अन्य देशों के सरकारों से उलट प्राम्भ से ही हमेशा मौन व्रत के परमान्द अवस्था में रही / सरकार अपने टैक्स वसूली में जिस इच्छाशक्ति का प्रयोग करती है उसका चार आना भी इन अमीर लूटेरों को पकड़ने में करती तो संभवतः ऐसी दुर्दिन स्थिति आती भी नहीं / देश के आबादी थमने का नाम नहीं ले रही है ….133 करोड़ के इस विशाल देश में सरकार की सभी आर्थिक –सामाजिक योजनाओं में 98 फीसदी से अधिक बैंकर रात-दिन और हॉलिडे –वोर्किंग डे का भेद मिटा कर काम कर रहे हैं…..यही सोच कर की कभी मुगाम्बो खुश होगा …..और बढ़ते मंहगाई के दौर में उचित वेतन वृद्धि की कृपा होगी/ जैसे PM जी को इस देश की चिंता है ठीक वैसे ही एक बैंकर को भी ऑफिस के बाद अपने बच्चों –परिवारों की चिंता रहती है / बढ़ते निजीकरण के प्रभाव से शिक्षा , चिकित्सा , भोजन और आवास सभी भयानक रूप से मंहगे हुए है / अत्यधिक विपरीत परिस्थियाँ ईमानदारी को वर्चुअल और सैधांतिक बना देती है और सिस्टम पर अपना दूरगामी प्रभाव छोडती है वहीँ अत्यधिक दौलत भी मनुष्य को चारित्रिक और नैतिक कंगाल / आवश्यकता है की शीघ्र अतिशीघ्र इस गगनचुंबी NPA को लुटेरे कॉर्पोरेटस से सरकार द्वारा सख्ती से वसूल किया जाय और बैंकों, बैंकरों और 100 करोड़ ग्राहकों की आर्थिक रक्षा सुनिश्चित की जाय तभी असल में संतुलन कायम होगा और राष्ट्र की रक्षा होगी /
अंत में …..इतना ही कहूँगा की की बदलते आर्थिक परिदृश्य में सम्मानजनक वेतन के लिए वही आवाज उठाते है जो ईमान और सम्मान से अपना काम करते हैं……नहीं तो बाकियों को अपनी सैलरी भी छूने की जरुरत नहीं पड़ती /
Source- Farwarded as recd

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