मनुष्य के पूर्वज बंदर है और मनुष्य की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है पर धरती पर आज भी इनका का अस्तित्व है क्यों?

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यह प्रश्न कई बार आपके मन में भी आया होगा। मनुष्य की उत्पत्ति बंदर यानी वानरों से हुई है लेकिन फिर भी इनका अस्तित्व आज भी कायम है अगर कायम है फिर भी यह प्रजाति मनुष्य की तरह बुद्धिमान क्यों नहीं है?

नहीं ऐसा नहीं है मनुष्य की उत्पत्ति बंदरों से नहीं हुई है जो सामान्यतः में आसपास दिखाई देते हैं मनुष्य की उत्पत्ति एप (APE) यानी बिना पूछकर बंदरो से हुई है। यह प्रजाति सभी मौजूदा बंदरों की प्रजाति यह सबसे करीब थी इसी से मनुष्य की उत्पत्ति पूर्ण रूप में हुई है। अगर विज्ञान के बात करें तो विकास के सिद्धांत के अनुसार यह प्रजाति कॉपी यह एक कॉमन प्रजाति है जिससे सारे मनुष्य एवं बंदरों की उत्पत्ति हुई है। इसकी भी एक कॉमन प्रजाति है जिससे इनका उत्पत्ति हुआ है । कहा जाए तो बंदर ही नहीं बल्कि हर वह प्रजाति जो इस धरती पर मौजूद है। सब की उत्पत्ति एक ही प्रजाति से हुई है।

क्या यह बात सौ प्रतिशत सत्य है?

हां यह बात सौ प्रतिशत सत्य है और जो व्यक्ति या कहता है कि विज्ञान चीजों को सिद्ध करके नहीं दिखाता वह व्यर्थ की बहस कर रहा होगा विज्ञान के क्षेत्र में विकासवाद या विकास का सिद्धांत उन कुछ कल्पनाओं में से एक है जिन्हें कार्य प्रमाणों के साथ सिद्ध किया जा चुका है भौतिकी में हम आज भी गुरुत्व को भलीभांति नहीं समझते हैं लेकिन हम यह जानते हैं कि यह बेसिर-पैर के विषय वस्तु नहीं है इसी तरह चार्ल्स डार्विन के विकास के सिद्धांत पूरी तरह से सत्य है और अन्य प्राइमेट्स*( primates मनुष्य की तरह दिखने वाले जानवर स्तनपाई में सर्वोच्च श्रेणी के जीव) के साथ भी हमारी समानता होने के प्रमाण मिलते हैं।

क्या हर जीव की उत्पत्ति एक ही जीव से हुई है?

अगर हम लोग विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार देखे तो हर एक जीव की उत्पत्ति एक ही जीव से हुई है। विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार आज से करीब 500 करोड़ साल पहले जब इस धरती पर जीवन की उत्पत्ति की शुरूआत हो रही थी। तब इस धरती पर केवल एक ही जीव था और वह जीव था एक कोशिकीय जीव यानी single cellular Organisms । जो धरती के उथले पानी में जीवन के रूप में बढ़ रहे थे। इनमें से कोई एक उथले पानी से बाहर आया होगा और कुछ सेकंड शायद जिंदा रह पाया होगा। वह क्या प्रक्रिया लाखों करोड़ों साल तक करता रहा होगा जिससे पानी से बाहर रहने की उसकी क्षमता विकसित हुई होगी और धीरे-धीरे उसने पानी से बाहर आकर अपनी छोटी-छोटी  कॉलोनियां या बनाई होगी। तब जाकर किसी बड़े जीव यानी Multi cellular ऑर्गनिस्मस बना होगा।

चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत जिसमें यह कहा गया है आज भी हर वह जीव अपने जन्म के पहले चरण यानी जब वह मां के गर्व मैं (जयगोट) होता है । तो उसकी समानता है अन्य जीवो किस तरह की होती है। चाहे वह स्तनपाई कोई भी जीव हो या फिर मेंढक, हो मछली हो , बंदर हो, पक्षी हो ,सब में एक जैसे ही समानताएं देखी जाती है।

तो वह बंदर कौन है जो बचे रह गए है?

आपको मैं यहां एक उदाहरण के तौर से समझाना चाहता हूं। यदि मेरे कुछ रिश्तेदार या कहें पूर्वज झारखंड ,छत्तीसगढ़ और अन्य प्रदेश से आए तो भी इन प्रदेशों में अभी भी मेरे रिश्तेदार क्यों रहते हैं? इसका सीधा सा उत्तर है कि मेरे सारे पूर्वज एक स्थान से निकलकर दूसरे स्थान को नहीं चले गए, कुछ चले गए और कुछ वहीं रहते हैं।

आज से करीब लगभग 50 से 70 लाख साल पहले कुछ हमारे सबसे पहले पूर्वज अफ्रीका के घने जंगल से निकलकर, सावना के घास के मैदान में जा बसे यहां उन्हें बिल्ली- शेर प्रजाति के जानवरों का सामना करना पड़ा, और इस प्रक्रिया में उसे और अधिक अनुकूल होती है।  उनकी बुद्धिमता बढ़ने लगी वह कुटुंब और समाज का निर्माण करने लगे। उन्होंने शिकार करने के साथ-साथ फलों को भी खाना शुरू कर दिया। इसके परिणाम स्वरुप वह एक ही जगह पर रहते हुए पर्याप्त संख्या में प्रजाति के रूप में बढ़ते रहे साथ ही जलवायु में आने वाले अनेक परिवर्तनों ने उन्हें स्वयं को अनुकूल बनाने और अन्य स्थान पर जाकर बसने के लिए प्रवृत्त किया । इस प्रकार वह अधिक स्मार्ट ,अधिक कुशल, अच्छा शिकारी भी बनते चले गए।

इसी बीच उनके जो साथ ही जंगल में पीछे छूट गए थे।  वह अपनी विकासवाद की मंद गति से विकसित होते रहे कालांतर में वे चिंपांजी , गोरिल्ला और बंदरों जैसे जीव फल बीन कर खाने वाले प्रजातियां ही बने रहे।

तो वह हमारी तरह मनुष्य क्यों नहीं बने?

क्योंकि उन्होंने उत्तरजीविता के लिए उन खतरों और चुनौतियों का सामना नहीं किया। जो हमारे पूर्वज को झेलनी पड़ी थी। वह उस प्रकार से उस दिशा दशा में नहीं ढले जिनमें में हम ढले यह अच्छा भी हुआ और बुरा भी।

यही कारण है कि आज भी हमारे पूर्वज कहे जाने वाले बंदर हमारे जैसे नहीं है और ना ही इस धरती पर मौजूद सबसे विकासशील प्रजाति कह जाने वाले मनुष्य उनकी तरह है। यही कारण है कि मनुष्य ने विकासवाद के सिद्धांत पर आगे बढ़ते हुए नई नई तकनीक विकसित की और आज जब उसने अंतरिक्ष पर भी अपना पहला कदम रख लिया है और नीति नए दिन विकास के पथ पर आगे बढ़ती जा रही है।

वही हमारे पूर्वज कहे जाने वाले बंदरों की प्रजाति जंगलों तक ही सिमट कर रह गई है ना ही उन्होंने हमारी तरह विकासवाद के उन कठिनाइयों को झेला है।