EVM जब विकसित देशों में नहीं, तो भारत में क्यों? सरकार व चुनाव आयोग पर निशाना

देश दुनिया

आजकल भारतीय राजनीति में EVM को लेकर चुनावी मुद्दा बना लिया गया है। हर समाचार पत्र के पेज में अक्सर पढ़ने को मिल जाता है। ईवीएम का इस्तेमाल बड़े-बड़े विकसित देश जब नहीं कर रहे हैं तो भारत में ही इसका इस्तेमाल क्यों हो रहा है?

ईवीएम को लेकर के भारत में एक राजनीति सी शुरु हो गई है। और शुरू हो भी क्यों ना? जल्दी चुनाव आने वाले हैं। मौजूदा लोकसभा का कार्यालय खत्म होने में 1 साल से भी कम समय बचा हुआ है। 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पक्ष विपक्ष दोनों ने अपनी ओर से तैयारियां शुरू कर दी है।

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वही विपक्षी दल महागठबंधन बनाने की तैयारी में जुटी है ताकि केंद्र में मौजूद एनडीए सरकार को किसी भी तरह हराया जा सके। लेकिन साथ ही साथ उसने ईवीएम को भी राजनीतिक मुद्दा बना लिया है। जब से केंद्र में मोदी की सरकार आई है। तब से सोशल मीडिया और इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो वायरल भी हो चुकी है, जिसमें कहा जा रहा था कि अन्य किसी को वोट देने पर स्वता: ही वोट बीजेपी पार्टी को जा रहा था।

ऐसे में जहां जनता सच में यह जानना चाहती है कि क्या वाकई ही ईवीएम को हैक किया जा सकता है। अगर ईवीएम का इस्तेमाल विकसित देशों में नहीं हो रहा है, तो भारत में ही इसका इस्तेमाल क्यों? इसके साथ ही एक खास रणनीति के तहत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की जगह मतपत्रों से भी वोटिंग कराने की भी जोर दिया जा रहा है। ऐसा मानना है कि पिछले कई चुनाव में बीजेपी को मिली सफलता से परेशान विपक्षी पार्टियां ने Evm को अविश्वसनीय मानते हुए मतपत्रों के जरिए वोटिंग कराने की मांग शुरू कर दी है। पार्टियों में सबसे अधिक मुख्य कांग्रेस पार्टी है। इस पार्टी को अपनी अभी तक की सबसे दयनीय स्थिति के लिए ईवीएम ही सबसे बड़ा खलनायक नजर आता है। उसका आरोप है कि bjp ईवीएम में गड़बड़ी करके ही चुनाव जिती आ रही है। यह वही कांग्रेस पार्टी है जिसने ईवीएम से चुनाव कराने के पक्ष में कहा था।

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भारत में पहली बार चुनाव ईवीएम द्वारा

सन 1982 में जब पहली बार केरल के पूर्व विधानसभा क्षेत्र के लिए चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था, उस समय केंद्र में सरकार कांग्रेस की थी। और कांग्रेस ने ईवीएम के पक्ष में अपनी राय दी थी। इसके बाद भी कांग्रेस हमेशा ईवीएम के पक्ष में वकालत करते नजर आए। 2017 में हुए गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पहले भी कांग्रेस ने ईवीएम के खिलाफ शोर मचाया था। लेकिन इस साल हुए पंजाब में चुनाव के दौरान कांग्रेस को जीत हासिल हुई और वहां के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ईवीएम में गड़बड़ी की किसी भी आशंका की बात को पूरी तरह खारिज कर दिया। उसके बाद कर्नाटका में हुए चुनाव में भी कांग्रेस ने ईवीएम में गड़बड़ी का राग अलापना शुरू कर दिया था। लेकिन बाद में जब बीजेपी बहुमत नहीं हासिल कर सकी तो कांग्रेस ने ईवीएम को लेकर अपनी चुप्पी साध ली थी। इससे तो स्पष्ट होता है कि जहां भी कांग्रेस को अपनी हार दिखती है, तो उन्हें सबसे पहले वहां ईवीएम में गड़बड़ी ही नजर आती है।

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किन किन देशों में ईवीएम का इस्तेमाल वोटिंग के लिए किया जाता है।

ऐसे तो देखा जाए तो विकसित देश भी ईवीएम को विश्वसनीय वोटिंग के इस्तेमाल में परहेज करते हैं। कई बड़े-बड़े समाचार पत्रों और रिसर्च में यह भी मान लिया गया है कि ईवीएम को हैक करना कोई बड़ी बात नहीं। क्योंकि अभी EVM भी एक आंतरिक मशीन है। जिस में खराबी या गड़बड़ी की जा सकती है। इसी चलते कई बड़े विकसित देशों में इसका इस्तेमाल नहीं होता है।

इसी कारण से कई बड़े विकसित देशों में ईवीएम का इस्तेमाल वोटिंग के लिए नहीं किया जाता। आइए देखते हैं ऐसे ही देशों की सूची:-

ऊपर दिए गए मानचित्र में यह देख सकते हैं कि कौन-कौन से देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। और किन-किन देशों में आंशिक रूप से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल हो रहा है। इससे तो यह साफ साफ पता चलता है कि ज्यादातर देशों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल अभी प्रारंभ नहीं हुआ है। इस सूची में कुछ ऐसे भी देश है जहां पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से वोटिंग कराई गई थी। लेकिन बाद में इसे अविश्वसनीय करते हुए इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया।

आने वाले कुछ ही दिनों में 4 विधानसभा और 4 राज्यों की विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इनमें से राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। इन चुनाव में विपक्षी पार्टी कांग्रेस हर हालत में मजबूत प्रदर्शन करना चाहती है और इसलिए उसने सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के इरादे से अपने सहयोगी दलों के साथ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का खुलकर विरोध करने का मन बनाया है। कांग्रेस की अगुवाई में उसके सहयोगी दल चुनाव आयोग से ईवीएम की जगह मतपत्रों से चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि इस मांग में कांग्रेस के साथ इंडिया में शामिल शिवसेना भी खड़ी है। कांग्रेस की अगुवाई में 17 पार्टियां अलग चुनाव मतपत्रों के जरिए कराने की मांग कर रही है। इन 17 पार्टी में शिवसेना को यदि अपवाद के रूप में छोड़ भी दिया जाए तो बाकी दर्द अपने-अपने क्षेत्रों में एक दूसरे के प्रतिद्वंदी भी है।

अगर मतपत्रों के द्वारा भारत में चुनाव ईवीएम को हटाकर हुआ तो यह दुनिया में पहला मौका नहीं होगा जब ऐसा हुआ है।

इससे पहले भी ऑस्ट्रेलिया आदि देशो में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को अविश्वसनीय बताकर उसे वोटिंग के लिए ऑस्ट्रेलिया में इस्तेमाल करने के बावजूद इसे बाद में हटा दिया गया था। इस सूची में ऐसे और भी कई देश शामिल है जहां पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की सहायता से वोट डाले जा चुके हैं लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया।

भारत में चुनाव आयोग ने ईवीएम पर सवालिया निशान लगाने वाले सभी राजनीतिक दलों को ईवीएम को हैक करके दिखाने की चुनौती भी दी थी। लेकिन आरोप लगाने वाली किसी भी पार्टी ने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया। और तो और दिल्ली विधानसभा में ईवीएम हैकिंग का डेमो दिखाने वाली आम आदमी पार्टी भी इस चुनौती का सामना करने से कतरा गई। निश्चित रूप से इन पार्टियों के पास ईवीएम के खिलाफ कोई सबूत नहीं है, लेकिन इसके विरोध को पूरे + तरीके से उठा कर वे इसे केंद्र सरकार के खिलाफ अपने एक हथियार के रूप में पेश करना चाहती है।

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इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर संदेह करना चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाने जैसा ही है। EVM का काम पूरी तरह से विश्वसनीय है और विश्व के कई देशों ने भारत को ईवीएम वोटिंग प्रणाली की प्रशंसा की है। विपक्ष इस बात को भी नजरअंदाज कर रहे हैं कि मतपत्रों के जरिए जब मतदान होता था, उस समय पर आया हर बार कई चुनाव क्षेत्र से गड़बड़ियों की तमाम शिकायतें सबूतों के साथ आती थी, लेकिन अभी ईवीएम के खिलाफ ऐसे कोई भी सबूत कोई भी पेश नहीं कर सका है। ऐसे में अगर आज भी ईवीएम का विरोध कर रहे हैं, तो इसका सीधा अर्थ ईवीएम को एक मुद्दा बनाकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की छवि मलिन करना ही है। अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वह चुनाव आयोग जैसे संविधानिक निकाय की प्रतिष्ठा को भी धूमिल करने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। लेकिन जब तक ईवीएम के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं दिया जाता है, तब तक आयोग को विपक्षी पार्टियों की इस मांग को कठोरता के साथ खारिज कर देना चाहिए।

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1 thought on “EVM जब विकसित देशों में नहीं, तो भारत में क्यों? सरकार व चुनाव आयोग पर निशाना

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