Inspirational story :- मंदबुद्धि

प्रेरणादायक कहानी

एक छोटे से गांव गंगानगर में राजू नाम का लड़का रहता था। उसकी मां उसे हमेशा परिश्रम और अच्छी तरह से पढ़ने के लिए कहती। लेकिन कितना भी कुछ क्यों ना कर लो राजू को कुछ भी समझ में नहीं आता था। राजू एक मंदबुद्धि बच्चों की तरह था।

इसीलिए उसकी मां ने सोचा कि यह बच्चा स्कूल जाएगा तो इसमें थोड़ी बहुत बुद्धि आ जाएगी। लेकिन विद्यालय में भी उसे हर कोई मन बुद्धि कहते थे। उसके गुरुजन भी उससे काफी नाराज रहते थे क्योंकि वह पढ़ने लिखने में काफी कमजोर था और उसकी बुद्धि का स्तर औसत से भी कम था।

अपनी कक्षा में व अन्य बच्चों से अलग रहता था। कक्षा में उसका प्रदर्शन हमेशा से ही खराब रहता था और बच्चे उसका मजाक उड़ाने से भी कभी नहीं चुकते थे। उसके लिए विद्यालय जाना मानव एक सजा के जैसी थी। वह जैसे ही अपनी कक्षा में प्रवेश करता बच्चे उस पर हंसने लगते, उसके कक्षा के बच्चे उसे महामूर्ख तो कोई उसे बैलों का राजा कहा करते थे। यहां तक कि कुछ अध्यापक भी उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते। इन सब से परेशान होकर उसने स्कूल जाना ही छोड़ दिया।

अब वह दिनभर इधर उधर भटकता और अपना समय बर्बाद करता। 1 दिन इसी तरह कहीं से जा रहा था, घूमते-घूमते उसे बहुत ही ज्यादा प्यास लगने लगी। वह इधर उधर पानी खोजने लगा। काफी देर तक पानी की तलाश करने के बाद उसे एक कुआं दिखाई दिया। वह कुएं पर गया और पानी खींच कर अपनी प्यास बुझाई। पानी खोजने के क्रम में उसने काफी ज्यादा दौड़-धूप कर ली थी इस चलते वह काफी थक चुका था। इस चलते पानी पीने के बाद वहीं बैठ गया। तभी उसकी नजर पत्थर पर पड़े उस निशान पर गई जिस पर बार-बार कुएं से पानी खींचने की वजह से रस्सी का निशान बन गया था।

वह मन ही मन सोचने लगा कि जब बार-बार पानी खींचने से इतने कठोर पत्थर पर भी रस्सी का निशान पड़ सकता है दो लगातार मेहनत करने से मुझे भी विद्या प्राप्त हो सकती है। उस बालक ने मन ही मन यह बात ठान ली कि वह फिर से विद्यालय जाना शुरु करेगा। और विद्या हासिल करके रहेगा। जब स्कूल जाना शुरू कर दिया तो कुछ दिनों तक लोग उसी तरह उसका मजाक उड़ाते रहे पर धीरे-धीरे उसकी लगन देखकर अध्यापकों ने भी उसे सहयोग करना शुरू कर दिया। उसने मन लगाकर अथक परिश्रम किया। और लगातार परिश्रम करता रहा। कुछ सालों बाद यह विद्यार्थी प्रखंड विद्वान वरदराज के रूप में विख्यात हुआ, जिसने संस्कृत में मुक्तिबोध और लघु सिद्धांत कौमुदी जैसे ग्रंथों की रचना की।

महान विद्वान वरदराज के जीवन की यह घटना हमें यह सिखाती है कि किसी भी कमजोरी पर जीत हासिल किया जा सकता है। बस जरूरत है कठिन परिश्रम और धैर्य के साथ अपने लक्ष्य के प्रति स्वयं को समर्पित करने की।

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